ग्रंथसार
माया का अंधकार तब तक जीव को घेरे रहता है जब तक वह प्रभु की शरणागति के सूर्य को अपने हृदय में धारण नहीं कर लेता।
उत्तरकाण्ड · प्रसंग 5
भक्ति और माया का स्वरूप