ग्रंथसार
सेवा का अर्थ केवल कर्म करना नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे अहंकार को मिटाकर ईश्वर के दर्शन करना है।
भक्ति साधना · पाठ 5
सेवा का भाव