ग्रंथसार
क्या कभी आपने सोचा है कि अपनी नियति को स्वीकार कर लेना ही वास्तव में उस शिखर तक पहुँचने का प्रथम सोपान है, जहाँ से संसार की जटिलताएँ सुलझने लगती हैं?
कर्म साधना · पाठ 2
धर्म और जीवन में अपना स्थान