ग्रंथसार
क्या कार्य में पूर्ण समर्पण और फल की आस का अभाव वास्तव में संभव है, या यह केवल एक कठिन आदर्श है?
कर्म साधना · पाठ 3
फल की आकांक्षा का त्याग