ग्रंथसार
मंदिर के भीतर सेवा केवल कार्य नहीं, बल्कि समर्पण की वह भाषा है जिसे शब्द नहीं चाहिए होते।
मंदिर और कला · पाठ 8
मंदिर जीवन में सेवा का भाव