ग्रंथसार
सेवा का अर्थ केवल कर्म नहीं, बल्कि एक ऐसा हृदय है जो संपूर्ण समाज को अपना विस्तार मानता है।
समाज और सेवा · पाठ 10
सेवा और समाज का समन्वय