ग्रंथसार
परंपरा के केंद्र में सदैव वह शक्ति रही है, जिसके बिना न तो सेवा पूर्ण है और न ही उपासना का कोई अर्थ है।
समाज और सेवा · पाठ 6
पूजन और सेवा में नारी की भूमिका