ग्रंथसार
फूल चाहे किसी भी क्यारी का हो, उसकी खुशबू ईश्वर की अनुकंपा का ही विस्तार है।
समाज और सेवा · पाठ 8
अंतरधार्मिक सौहार्द और शिष्टाचार