ग्रंथसार
२७ अगस्त १९८२ का वह दिन था, जब देहरादून के किशनपुर में उन्होंने अपना शरीर त्यागा और उस परमतत्व में विलीन हो गईं, जिसकी वे स्वयं एक जीवंत अभिव्यक्ति थीं।
श्री आनन्दमयी माँ · पाठ 10
अंतिम अध्याय और अनंत प्रेरणा