ग्रंथसार
सन् उन्नीस सौ बाईस के आसपास बाजितपुर में उनके जीवन की एक ऐसी घटना घटी, जो साधकों के जगत में विरली ही देखने को मिलती है।
श्री आनन्दमयी माँ · पाठ 4
बाजितपुर में आत्म-दीक्षा