ग्रंथसार
जैसे एक निर्मल नदी हर भूमि को सींचती हुई आगे बढ़ती है, वैसे ही श्री आनन्दमयी माँ अपनी यात्राओं से सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपने सान्निध्य से पवित्र करने निकलीं।
श्री आनन्दमयी माँ · पाठ 7
भारतवर्ष में माँ की यात्राएँ