ग्रंथसार
वृंदावन की पावन भूमि पर, जब रात्रि का अंधकार छँटने को होता है और ब्रह्म-मुहूर्त की दिव्य बेला उतरती है, तब एक मौन साधना जीवंत हो उठती है।
श्री प्रेमानन्द जी महाराज · पाठ 10
भोर की पदयात्रा