ग्रंथसार
जैसे नदी सागर की ओर सहज ही बहती है, वैसे ही उस युवा हृदय में वैराग्य की धारा प्रबल होती जा रही थी।
श्री प्रेमानन्द जी महाराज · पाठ 3
वैराग्य की पुकार