ग्रंथसार
त्याग और तपोबल की मूरत ऋषि अत्रि और माता अनसूया का जीवन हमें सिखाता है कि गृहस्थ आश्रम में रहकर भी दिव्यता को कैसे पाया जा सकता है।
ऋषि परम्परा · पाठ 4
अत्रि और अनसूया