ग्रंथसार
संत सूरदास जी अपनी आँखों से नहीं, बल्कि अपने हृदय की दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप का ऐसा अद्भुत दर्शन करते हैं, मानो वे स्वयं वहाँ उपस्थित हों।
संत सूरदास · पाठ 4
सूरसागर में बाल-लीला