ग्रंथसार
ध्वनि में एक ऐसी प्राणशक्ति होती है जो अक्षरों की निर्जीव रेखाओं में नहीं मिल सकती, इसीलिए हमारी परंपरा मुख से मुख तक प्रवाहित हुई।
व्यास और कथावाचक परम्परा · पाठ 8
मौखिक परंपरा और उसका महत्व