ग्रंथसार
गंगा की शीतल लहरें केवल जल नहीं, अपितु हमारे अंतर्मन की समस्त तृष्णाओं को धो देने वाला अमृत हैं।
सप्त पुरी · पाठ 6
हरिद्वार की अविरल धारा