ग्रंथसार
चेतना के अनंत विस्तार को अनुभव करने वाला वह दृष्टा जो देह की सीमाओं को लांघकर स्वयं को ही सर्वव्यापी सत्य के रूप में पहचान लेता है।
ऐतरेय उपनिषद् · उपनिषद् 7
दृष्टा का उन्मुक्त स्वरूप