ग्रंथसार
चेतना का जो सूक्ष्म अंश मनुष्य के भीतर प्राण बनकर स्पंदित हो रहा है, वही विश्व के अनंत रूपों में व्याप्त होकर समस्त जगत को आधार प्रदान करता है।
ऐतरेय उपनिषद् · उपनिषद् 8
समस्त जीव-जगत में चेतना का विस्तार