ग्रंथसार
ब्रह्मांड की रचना से मनुष्य के अस्तित्व के उत्कर्ष तक की वह यात्रा, जो आत्म-चेतना को ही परम सत्य स्वीकार करती है।
ऐतरेय उपनिषद् · उपनिषद् 9
मानव जीवन की गरिमा