ग्रंथसार
सृष्टि के आदि में वह विराट अश्व ही काल और अस्तित्व का आधार बनकर प्रकट हुआ, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित है।
बृहदारण्यक उपनिषद् · उपनिषद् 1
विराट अश्व और जगत का विस्तार