ग्रंथसार
याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी का संवाद उस अद्वैत प्रेम की पराकाष्ठा है, जहाँ व्यक्तिगत मोह विलीन होकर ब्रह्मांडीय चेतना में समा जाता है।
बृहदारण्यक उपनिषद् · उपनिषद् 4
मैत्रेयी और प्रेम का दर्शन