ग्रंथसार
क्या आपने कभी अपने भीतर उस अनंत आकाश को अनुभव किया है, जहाँ समस्त ब्रह्मांड का कोलाहल शांत होकर स्वयं परमात्मा के रूप में स्पंदित होता है?
छान्दोग्य उपनिषद् · उपनिषद् 13
हृदय के भीतर का आकाश