ग्रंथसार
क्या कभी आपने सोचा है कि सब कुछ लुटाकर भी आप कम क्यों नहीं होते, बल्कि पूर्णता के और निकट पहुँच जाते हैं?
ईश उपनिषद् · उपनिषद् 12
अनंत शेष