ग्रंथसार
जीवन की ढलती साँझ में जब सब कुछ ओझल होने लगता है, तब केवल वही शेष रहता है जिसे हमने पूरी निष्ठा से संजोया होता है।
ईश उपनिषद् · उपनिषद् 9
जीवन की संध्या और अंतिम यात्रा