ग्रंथसार
मृत्यु के द्वार पर प्रतीक्षा करती हुई वह बालक की निष्ठा ही थी, जिसने काल को भी गुरु बनने पर विवश कर दिया।
कठ उपनिषद् · उपनिषद् 2
तीन रातें और तीन वरदान