ग्रंथसार
जीवन का स्पंदन ही परमात्मा का साक्षात्कार है, जहाँ प्राण स्वयं चेतना के रूप में विद्यमान हैं।
कौषीतकि उपनिषद् · उपनिषद् 3
प्राण ही चेतना है