ग्रंथसार
प्राण ही वह परम सत्य है जो चेतना के साथ मिलकर देह की हर धड़कन और अनुभव को संचालित करता है।
कौषीतकि उपनिषद् · उपनिषद् 8
प्राण और चेतना का अभेद