ग्रंथसार
एक ही अग्नि से उत्पन्न असंख्य चिंगारियों की भाँति, सारा चराचर जगत उसी एक अक्षर ब्रह्म का विस्तार है।
मुण्डक उपनिषद् · उपनिषद् 4
अग्नि से निकली चिंगारियाँ