ग्रंथसार
अगोचर परमात्मा की सत्ता को पहचानकर, साधक अपनी चेतना में उस छिपी हुई दिव्य अग्नि का साक्षात्कार करता है जो समस्त सृष्टि का आधार है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् · उपनिषद् 3
छिपी हुई अग्नि