ग्रंथसार
ज्ञान की साधना केवल शब्दों का संचय नहीं, अपितु वक्ता, श्रोता और उनके मिलन के मध्य सृजित होने वाली एक जीवंत और सामंजस्यपूर्ण प्रक्रिया है।
तैत्तिरीय उपनिषद् · उपनिषद् 1
अध्ययन का सामंजस्य