ग्रंथसार
आनंद की उस विराट अनुभूतियों का वर्णन, जहाँ मनुष्य का बोध सीमित जगत से निकलकर परमानंद के अनंत विस्तार में लीन हो जाता है।
तैत्तिरीय उपनिषद् · उपनिषद् 10
आनंद की अनंत व्याप्ति