ग्रंथसार
आनंद की अनुभूति से सराबोर होकर जीवन को एक उत्सव के रूप में जीने का रहस्य ही इस ज्ञान का चरम पड़ाव है।
तैत्तिरीय उपनिषद् · उपनिषद् 12
उत्सवमय जीवन का समापन