ग्रंथसार
ब्रह्म की अनंतता को समझकर, भयमुक्त होकर आनंद के सोपानों पर चढ़ना ही सच्चा जीवन है।
तैत्तिरीय उपनिषद् · उपनिषद् 2
जीवन जीने की कला