ग्रंथसार
अन्नमय देह के भीतर छिपे मन के सूक्ष्म संसार की खोज ही जीवन की अगली बड़ी यात्रा है।
तैत्तिरीय उपनिषद् · उपनिषद् 5
मनोमय कोश