ग्रंथसार
ब्रह्मविद्या की पूर्णता और आनंद के साक्षात्कार के उपरांत, शिष्य का अपनी चेतना को विराट् जगत में प्रसारित करने का अनुभव ही इस बोध का सार है।
तैत्तिरीय उपनिषद् · उपनिषद् 8
पुत्र की वापसी