ग्रंथसार
मुक्ति का अर्थ कहीं दूर जाना नहीं, बल्कि अपने ही सत्य स्वरूप में स्थित हो जाना है।
सनत्कुमार पुराण · अध्याय 12
अंतिम मुक्ति