ग्रंथसार
शीतकाल की ठिठुरती संध्या में जब दीपक की लौ कांपती है, तब गृहस्थ का संयम ही उसके भीतर के प्रकाश को अक्षुण्ण रखता है।
शिशिर के पर्व · पाठ 7
गृहस्थ के व्रत और अनुष्ठान