ग्रंथसार
यह कथा है एक माँ के अनजाने में हुए पाप, उसके प्रायश्चित और अटूट विश्वास की, जिसने मृत्यु पर भी विजय पा ली।
व्रत कथाएँ · पाठ 6
अहोई अष्टमी