ग्रंथसार
गृहस्थी केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि प्रेम और शांति से बुना हुआ एक जीवंत मंदिर है।
अथर्ववेद · अध्याय 3
गृहस्थ और सामंजस्य