ग्रंथसार
आश्रम की शांत वेदी के निकट बैठे ऋषि मधुच्छन्दा ने देवरात की जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा, 'वत्स, अग्नि केवल काष्ठ का दहन नहीं, वह तो स्वयं परमात्मा की ओर जाने का जीवंत मार्ग है।'
ऋग्वेद · अध्याय 25
अग्नि का सार: दिव्य संदेशवाहक