ग्रंथसार
गुरुदेव, ये वायु तो अदृश्य होकर भी संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी गति से थामे हुए है, क्या यही चराचर जगत का प्राण है?
ऋग्वेद · अध्याय 12
प्रथम मंडल: वायु का ब्रह्मांडीय श्वास