ग्रंथसार
नदी के तट पर बैठे ऋषि मधुच्छन्दा ने जल की लहरों की ओर इशारा करते हुए देवरात से कहा कि यह केवल बहता हुआ नीर नहीं, अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड का प्राण है।
ऋग्वेद · अध्याय 18
प्रथम मंडल: अपः — ब्रह्मांडीय जलतत्व