ग्रंथसार
गुरु के कंठ से निकली ध्वनि जब शिष्य की मेधा में स्पंदित होती है, तभी ऋग्वेद की शाश्वत धारा का प्रवाह अक्षुण्ण बना रहता है।
ऋग्वेद · अध्याय 24
श्रुति परंपरा: वाचिक विरासत