ग्रंथसार
राजसूय यज्ञ केवल विजय का उद्घोष नहीं, अपितु राज्यधर्म के प्रति राजा का आत्मसमर्पण है।
यजुर्वेद · अध्याय 8
राजसूय का दिव्य गौरव