ग्रंथसार
हमारा यह शरीर तो बस एक ऊपरी आवरण है, जिसके भीतर चेतना की कई परतें छिपी हुई हैं।
आत्मा और ब्रह्म · पाठ 4
अस्तित्व के पाँच कोश