ग्रंथसार
भक्ति कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि हृदय की वह अवस्था है जहाँ प्रेमी और प्रेम एक हो जाते हैं।
भक्ति, ज्ञान और कर्म · पाठ 2
भक्ति का स्वरूप और मनोभाव