ग्रंथसार
हम जो आज बोते हैं, वही भविष्य के गर्भ में फल के रूप में संचित होता है, क्योंकि कर्म केवल क्रिया नहीं, बल्कि हमारी चेतना का विस्तार है।
धर्म, कर्म और मोक्ष · पाठ 2
कर्म: क्रिया और चेतना का ताना-बाना