ग्रंथसार
शक्ति का वास्तविक गौरव विजय प्राप्त करने में नहीं, बल्कि उसे सेवा के चरणों में समर्पित कर देने में है।
वीर चरित्र · पाठ 2
हनुमान और सेवा का बल