ग्रंथसार
क्या कर्म का बोझ आत्मा की मौलिक पवित्रता को स्थायी रूप से धूमिल कर सकता है, या यह केवल एक अस्थायी आवरण है जो हमारे संकल्पों से पिघल सकता है?
जैन दर्शन · पाठ 3
कर्म का भार